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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड दोहा 305

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल । जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल ॥ ३०५ ॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

(बाराती तथा अगवानों में से) कुछ लोग परस्पर मिलने के लिए हर्ष के मारे बाग छोड़कर सरपट दौड़ चले और ऐसे मिले मानो आनंद के दो समुद्र मर्यादा छोड़कर मिलते हों ॥ ३०५ ॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 305 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik