वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि। सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि॥344॥
अनेक प्रकार के मंगल-कलश घर-घर सजाकर बनाए गए हैं। श्रीरघुनाथजी की पुरी अयोध्या को देखकर ब्रह्मा आदि सब देवता सिहाते हैं॥344॥
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