वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ। कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ॥353॥
नगाड़े बजाकर और परम सुख प्राप्त कर देवता अपने-अपने लोकों को चले। वे एक-दूसरे से श्रीरामजी का यश कहते जाते हैं। हृदय में प्रेम समाता नहीं है॥353॥
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