वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोधा । सकल सभहि हटकि तब बोलीं बचन सकोधा ॥ ६३ ॥
परंतु उनसे शिवजीका अपमान सहा नहीं गया, इससे उनके हृदयमें कुछ भी प्रबोध नहीं हुआ। तब वे सारी सभाको हटपूर्वक डाँटकर क्रोधभरे वचन बोलीं- ॥ ६३ ॥
आगे पढ़ें — बाल काण्ड के सभी पद · श्रीरामचरितमानस