वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
जौं अस हठ करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान । परहिं कल्प भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान ॥ ६९ ॥
यदि मूर्ख मनुष्य ज्ञानके अभिमानसे इस प्रकार हठ करते हैं तो वे कल्पभरके लिये नरकमें पड़ते हैं। भला, कहीं जीव भी ईश्वरके समान (सर्वथा स्वतन्त्र) हो सकता है? ॥ ६९ ॥
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