वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
सुनत बचन बिहसे ऋषय गिरिसंभव तब देह । नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह ॥ ७८ ॥
पार्वतीजीकी बात सुनते ही ऋषिलोग हँस पड़े और बोले- तुम्हारा शरीर पर्वतसे ही तो उत्पन्न हुआ है! भला, कहाँ तो नारदका उपदेश सुनकर आजतक किसका घर बसा है? ॥ ७८ ॥
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