मातृका देवी / वर्णेश्वरी (अनाहत चक्र की पंखुड़ियाँ) बीज बीज मंत्र
कं, खं, गं, घं, ङं, चं, छं, जं, झं, ञं, टं, ठं
दिव्य प्रेम, अपार करुणा, और भय-मुक्त अवस्था की प्राप्ति 3।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
दिव्य प्रेम, अपार करुणा, और भय-मुक्त अवस्था की प्राप्ति 3।
इस मंत्र से क्या होगा?
दिव्य प्रेम, अपार करुणा, और भय-मुक्त अवस्था की प्राप्ति
जाप विधि
हृदय चक्र की बारह पंखुड़ियों का ध्यान करते हुए जप 2।
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सीता राम सीता राम जय जय सीता राम
sabar mantraओम गुरु जी शिव बैठे कैलाश विष्णु बैठे बैकुंठ मेरी भक्ति शिव की शक्ति पूजू अमुक देव मनाऊं तो आवे ना आवे तो दुहाई शिव शंकर की दुहाई माता काली की दुहाई गुरु गोरखनाथ की 1
ugra mantraॐ हूं स्फारय-स्फारय, मारय-मारय, शत्रु-वर्गान् नाशय-नाशय स्वाहा
naam mantraचामुंडा
navgrah mantraऐं ह्सौः श्रीं द्रां कं ग्रहाधिपतये भौमाय स्वाहा॥
kavach mantraनासां वैवस्वत: पातु मुखं मे भास्कर: सदा । नाभिं गृहपति: पातु मन्द: पातु कटिं तथा । पदौ मन्दगति: पातु सर्वांग पातु पिप्पल: । आंगो पांगानी सर्वानी रक्षे में सूर्य नंदन इत्तेत कवच देव पठे सूर्य सुतस्य यह नतस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्य जह व्यय जन्म द्वितीय मृत्यु स्थान गतो पिवा कलस्थो गतो वापी सुप्रीतु सदाशनी अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्म द्वितीयगे। कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित्। इत्य तत कवचम दिव्यम सौरे निर्मित पुरा जन्म लग्न स्थिता दोषा सर्वान नाश्यते प्रभु इति शनि कवच संपूर्णं ॥ 20