ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
उद्देश्य अनुसार मंत्र
कुबेर (यक्ष धन-धान्य मूल मंत्र)

कुबेर (यक्ष धन-धान्य मूल मंत्र) मूल मंत्र

ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्यधिपतये धनधान्यसमृद्धिम मे देहि दापय स्वाहा

रुके हुए या खोए हुए धन की पुनः प्राप्ति, अष्ट-लक्ष्मी का वास, विपुल संपत्ति और कभी न समाप्त होने वाले ऐश्वर्य की सिद्धि 1।

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

जप काउंटर लोड हो रहा है...

प्रकारमूल मंत्र
प्रयोजन

यह मंत्र क्यों?

रुके हुए या खोए हुए धन की पुनः प्राप्ति, अष्ट-लक्ष्मी का वास, विपुल संपत्ति और कभी न समाप्त होने वाले ऐश्वर्य की सिद्धि 1।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

रुके हुए या खोए हुए धन की पुनः प्राप्ति, अष्ट-लक्ष्मी का वास, विपुल संपत्ति और कभी न समाप्त होने वाले ऐश्वर्य की सिद्धि

जाप विधि

धनतेरस, दीपावली या नित्य प्रातः कुबेर यंत्र के समक्ष कमलगट्टे की माला से जप करें। कुबेर सिद्धि हेतु १०८ दिनों तक प्रतिदिन ७२० बार (कुल ७२,००० बार) जप करने का विशेष तांत्रिक विधान है 1।

विशेष टिप्पणियाँ

इसे भी पढ़ें

अलग-अलग श्रेणियों से

हर श्रेणी से एक चुनिंदा मंत्र — नया खोजें

kavach mantra

स्कन्धौ पातु गजस्कन्धः स्तनौ विघ्नविनाशनः । हृदयं गणनाथस्तु हेरम्बो जठरं महान् ॥ धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरः शुभः । लिङ्गं गुह्यं सदा पातु वक्रतुण्डो महाबलः ॥ गणक्रीडो जानुजङ्घे ऊरू मङ्गलमूर्तिमान् । एकदन्तो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदाऽवतु ॥ क्षिप्रप्रसादनो बाहू पाणी आशाप्रपूरकः । अङ्गुलीश्च नखान्पातु पद्महस्तोऽरिनाशनः ॥ सर्वाङ्गानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदाऽवतु । अनुक्तमपि यत्स्थानं धूम्रकेतुः सदाऽवतु ॥ आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोऽवतु । प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥ दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैऋत्यां तु गणेश्वरः । प्रतीच्यां विघ्नहर्ताऽव्याद्वायव्यां गजकर्णकः ॥ कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्यामीशनन्दनः । दिवाऽव्यादेकदन्तस्तु रात्रौ सन्ध्यासु विघ्नहृत् ॥ 14

gyan mantra

ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

vaidik mantra

ॐ सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव । हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।

jap mantra

ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः

tantrik mantra

ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ॐ ह्रीं ह्रीं हूं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा

stotra mantra

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु- र्जन्तुः पुनः कोsर्हति गन्तुमीरितुम । यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥ 4