शनि नवग्रह मंत्र
ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्रवन्तु न:।।
शनि की महाकष्टकारी साढ़ेसाती, ढैय्या, मारक महादशा, शनि के मेष राशि (नीच) में होने पर उत्पन्न भयंकर वात रोग, दीर्घकालिक असाध्य बीमारियों, नौकरी या व्यापार में अचानक पतन, और जीवन में अकारण हो रहे घोर वि
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
शनि की महाकष्टकारी साढ़ेसाती, ढैय्या, मारक महादशा, शनि के मेष राशि (नीच) में होने पर उत्पन्न भयंकर वात रोग, दीर्घकालिक असाध्य बीमारियों, नौकरी या व्यापार में अचानक पतन, और जीवन में अकारण हो रहे घोर विलंब को दूर कर धैर्य, कर्मठता और न्याय की प्राप्ति हेतु यह यजुर्वेदीय मंत्र अचूक है। 2
इस मंत्र से क्या होगा?
शनि की महाकष्टकारी साढ़ेसाती, ढैय्या, मारक महादशा, शनि के मेष राशि (नीच) में होने पर उत्पन्न भयंकर वात रोग, दीर्घकालिक असाध्य बीमारियों, नौकरी या व्यापार में अचानक पतन, और जीवन में अकारण हो रहे घोर विलंब को दूर कर धैर्य, कर्मठता और न्याय की प्राप्ति हेतु यह यजुर्वेदीय मंत्र अचूक है
जाप विधि
शनिवार को सायं या रात्रिकाल में शनि की होरा अथवा पुष्य, अनुराधा या उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में पश्चिम दिशा की ओर मुख करके आरंभ करें। काले या नीले आसन पर बैठकर नीलम अथवा रुद्राक्ष की माला से चालीस दिनों के भीतर तेईस हजार मंत्रों का जप अनिवार्य है। अनुष्ठान के पूर्ण होने पर काले तिल मिश्रित शमी वृक्ष की लकड़ी से दशांश हवन करें। 7
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ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
beej mantraत्व्म्श्रीः
stotra mantraव्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे । नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥ 10
mool mantraॐ बुद्धाय नमः
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vaidik mantraॐ शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम् । पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः ॥