मंगल नवग्रह मंत्र
ॐ अग्निमूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अयम्। अपां रेतां सि जिन्वति।।
कुंडली में मंगल के कर्क राशि (नीच) में होने, भयंकर मांगलिक दोष, रक्त विकार, अग्नि भय, अस्त्र-शस्त्र से चोट के भय, गंभीर ऋण और भूमि या पैतृक संपत्ति के विवादों के शास्त्रसम्मत निवारण हेतु इस वैदिक मंत्
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
कुंडली में मंगल के कर्क राशि (नीच) में होने, भयंकर मांगलिक दोष, रक्त विकार, अग्नि भय, अस्त्र-शस्त्र से चोट के भय, गंभीर ऋण और भूमि या पैतृक संपत्ति के विवादों के शास्त्रसम्मत निवारण हेतु इस वैदिक मंत्र का प्रयोग किया जाता है। 1
इस मंत्र से क्या होगा?
कुंडली में मंगल के कर्क राशि (नीच) में होने, भयंकर मांगलिक दोष, रक्त विकार, अग्नि भय, अस्त्र-शस्त्र से चोट के भय, गंभीर ऋण और भूमि या पैतृक संपत्ति के विवादों के शास्त्रसम्मत निवारण हेतु इस वैदिक मंत्र का प्रयोग किया जाता है
जाप विधि
मंगलवार के दिन मंगल की होरा अथवा मृगशिरा, चित्रा या धनिष्ठा नक्षत्र में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अनुष्ठान आरंभ करें। लाल ऊनी आसन पर बैठकर मूंगा या लाल चंदन की माला से चालीस दिनों में दस हजार मंत्रों का जप अनिवार्य है। अनुष्ठान पूर्ण होने पर खैर (खदिर) की लकड़ी से दशांश हवन करें। 1
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bhakti mantraॐ नमो नारायणाय
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ugra mantraॐ अक्षय श्री छिन्नमस्ता देवी जगत निवासनी अदृश्य सिद्धि शून्य गमन विजयै मम सिद्धि देहि देहि प्राण देहि देहि मम अमुक गौत्र अमुक शर्मा ह गुरूत्वाकर्षण शक्ति नाशय शून्य सिद्धि प्राप्तर्थं शक्ति स्याद विनियोग