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पढ़िए: रामचरितमानस का पाठ – अयोध्या कांड (प्रथम संस्करण) राम का राज्याभिषेक और मंथरा की कुटिलता! संक्षेप में, सरल और सटीक रूप में
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राम का राज्याभिषेक और देवताओं की चिंता

पोस्ट 1: राम का राज्याभिषेक और देवताओं की चिंता

परिचय:

अयोध्या नगरी में हर्ष और उत्साह का वातावरण है। महाराज दशरथ अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम का राज्याभिषेक करना चाहते हैं। राम, जो मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में सबके आदर्श हैं, उनकी सरलता, शौर्य और धर्मनिष्ठा के कारण प्रजा उनसे अत्यंत प्रेम करती है। सभी लोग आनंदित हैं कि अयोध्या को जल्द ही ऐसा धर्मपरायण राजा मिलेगा।

राज्याभिषेक की तैयारी:

महाराज दशरथ ने गुरुओं और मंत्रियों से परामर्श कर शुभ मुहूर्त में राम के राज्याभिषेक की घोषणा करवाई। अयोध्या में उत्सव जैसा माहौल है – घर-घर दीप जल रहे हैं, फूलों की मालाएँ सजी हैं और मंगलगान हो रहे हैं। नागरिक अपने प्रिय राजकुमार राम के राज्याभिषेक के समाचार से अत्यंत प्रसन्न हैं। स्वयं दशरथ को अपना जीवन धन्य लगता है कि उन्हें राम जैसा गुणी पुत्र मिला है। तुलसीदास जी लिखते हैं:

"भूरि भाग्य दशरथ सम नाहीं। मंगल मूल रामु सुत जासू।।"

इसका सरल अर्थ है कि दशरथ के समान सौभाग्यशाली तीनों लोकों में कोई नहीं है, जिनके पुत्र स्वयं कल्याण के मूल भगवान राम हैं। सचमुच, दशरथ का यश और भाग्य राम जैसे बेटे से ही है।

देवताओं की चिंता:

लेकिन स्वर्ग में देवताओं को एक चिंता सताने लगी। वे जानते थे कि राम विष्णु के अवतार हैं और राक्षसराज रावण के वध के लिए पृथ्वी पर आए हैं। यदि राम अयोध्या के राजा बन गए और सुखपूर्वक राज्य करने लगे, तो रावण का अंत कैसे होगा? देवताओं को भय हुआ कि राम का राज्याभिषेक रावण-विनाश के मिशन में बाधा न बन जाए। तब सभी देवता ब्रह्माजी के पास गए और उपाय सोचने लगे।

देवताओं ने सरस्वती देवी से प्रार्थना की कि वह किसी तरह इस परिस्थिति को टालें। सरस्वती ने देवताओं की विनती स्वीकार की और निश्चय किया कि राजा दशरथ की सबसे प्रिय रानी कैकेयी की दासी मंथरा की बुद्धि फेरकर कुछ विघ्न डाला जाए। उधर कैकेयी राम को अपने पुत्र भरत जितना ही स्नेह करती थीं। उन्हें राम के राज्याभिषेक से कोई आपत्ति नहीं, बल्कि खुशी ही थी। स्वयं राम भी कैकेयी का आदर मां कौसल्या के समान ही करते थे।

मंथरा की कुटिल बुद्धि

देव शक्ति से प्रेरित होकर मंथरा को अचानक एहसास हुआ कि राम का राजा बनना कैकेयी और भरत के लिए ठीक नहीं होगा। उसने कैकेयी को राजमहल की छत से जनता का उल्लासपूर्ण नज़ारा दिखाया और चिकनी-चुपड़ी बातें शुरू कीं। पहले तो कैकेयी मंथरा की बात समझ नहीं पाईं। उन्होंने कहा कि "राम तो मुझे माता कौसल्या के समान ही मानते हैं और मुझसे भी बहुत स्नेह रखते हैं।"

तुलसीदासजी वर्णन करते हैं कि कैकेयी को पूरा विश्वास था राम के प्रेम में:

"कौसल्या सम सब महतारी, रामहि सहज सुभाय पिआरी।
मो पर करहिं सनेहु विशेषी, मैं करि प्रीति परीछा देखी।।"

अर्थात कैकेयी कहती हैं कि राम सभी माताओं को कौसल्या के समान ही मानते हैं। राम स्वभाव से ही सब माताओं से प्यार करते हैं और मुझ पर तो उनका विशेष स्नेह है – मैंने स्वयं उनकी प्रेम-परीक्षा करके देखी है। कैकेयी को भरोसा था कि राम के राजा बनने से भी उनके अपने स्थान को कोई खतरा नहीं।

लेकिन मंथरा चालाकी से कैकेयी के मन में विष घोलने लगी। उसने पूछा, "यदि राम राजा बन गए तो महारानी कौन होगी? तुम्हें क्या लगता है?" कैकेयी चौंकी – "निश्चय ही माँ कौसल्या महारानी बनेंगी," उसने उत्तर दिया।

इस पर मंथरा ने आह भरकर कहा, "फिर तो सोचो रानी, तुम्हारा महत्व राजमहल में कम नहीं हो जाएगा? भरत तो महल के कोने में रह जाएंगे।" यह सुनते ही कैकेयी के मन में शंका के बीज पड़ गए। मंथरा ने आगे कहा कि अब भी समय है, अपने हित के लिए सोचना चाहिए। धीरे-धीरे मंथरा ने कैकेयी को समझाया कि दशरथ ने पूर्व में जो दो वरदान देने का वचन दिया था, वही माँग कर वह राम के राज्याभिषेक को रोक सकती है।

मंथरा की बातें सुनकर कैकेयी के हृदय में विष भर गया। अब उसे सचमुच लगने लगा कि यदि राम राजा बन गए तो भविष्य में भरत उपेक्षित हो सकते हैं। मंथरा ने आग में घी डालते हुए कहा, "कल सवेरे राम का तिलक होने से पहले ही आपको महाराज से अपने वरदान मांग लेने चाहिए।" यह राय देते ही मंथरा ने कैकेयी को याद दिलाया कि दशरथ ने कभी दो वचन दिए थे – अब उन्हें पूरा करने का समय आ गया है।

निर्णय की घड़ी आ चुकी थी। सीधी-सादी किंतु भावना में बह चली कैकेयी ने निश्चय कर लिया कि वह मंथरा की सलाह मानेगी। वह क्रोध (या कपट) का आवरण ओढ़कर कोपभवन में जाकर धरती पर लेट गई, अपने आभूषण त्याग दिए और रोने-धोने का अभिनय करने लगी। उसकी ये दशा देखकर दासी मंथरा अंदर ही अंदर प्रसन्न थी कि उसकी चाल सफल हो रही है। महारानी कैकेयी अब पूरी तरह मंथरा के वश में थीं।

इस प्रकार अयोध्या में जहाँ एक ओर राम के राज्याभिषेक की तैयारियाँ जोरों पर थीं, वहीं रात के अंधेरे में महल के भीतर एक भयंकर विप्लव की नींव पड़ चुकी थी। देवताओं की योजना के अनुरूप मंथरा ने कैकेयी की बुद्धि में ज़हर घोल दिया था। आगे क्या होगा? यही सोचकर मंथरा मुस्कुराती है और कैकेयी को पक्का यकीन दिलाती है कि कल सुबह होने से पहले ही महाराज दशरथ से वचन मांगकर वह अपनी बात मनवा लेगी।

कैकेयी क्रोध और भ्रम में भर चुकी थी, लेकिन दिल में अपने पुत्र भरत के प्रति मोह और मंथरा की बातों का प्रभाव हावी था। उधर, भोलेभाले दशरथ इस षड्यंत्र से अनजान राम के राज्याभिषेक का शुभ समाचार देने कैकेयी के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे। अयोध्या की भाग्यरेखा करवट ले रही थी।

समापन:

इस पहले भाग में हमने देखा कि कैसे राम के राज्याभिषेक की तैयारी से शुरू हुई प्रसन्नता देवताओं की चिंता का कारण बनी। मंथरा की कुटिल बुद्धि ने कैकेयी जैसी स्नेहमयी रानी के मन में भी भरत के लिए लोभ और राम के प्रति द्वेष जगा दिया। आगे के प्रसंग में हम देखेंगे कि कैकेयी अपने वरदान किस प्रकार मांगती है और इसका परिणाम अयोध्या पर कैसा पड़ता है।

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