विस्तृत उत्तर
कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद के प्रथम अध्याय में सत्यलोक की वास्तुकला का विवरण मिलता है। विजरा नदी के पार और इल्या वृक्ष से आगे सलज्ज नामक नगर है। इसी नगर में अपराजिता नामक भवन स्थित है। अपराजिता का शाब्दिक अर्थ है जो कभी पराजित न हो। यह ब्रह्मा जी का वह दिव्य भवन है जहाँ से ब्रह्माण्ड का संचालन होता है। इस भवन के भीतर विभु नामक एक विशाल प्रांगण है। इस प्रांगण में विचक्षण नामक सिंहासन है जिस पर अमितौजस (असीम तेज वाला) नामक आसन है जहाँ ब्रह्मा जी विराजमान रहते हैं। इस लोक के मुख्य द्वार पर इन्द्र और प्रजापति द्वारपाल के रूप में उपस्थित रहते हैं।
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