विस्तृत उत्तर
अष्टविनायक महाराष्ट्र के आठ स्वयंभू (स्वतः प्रकट) गणेश मंदिरों का पवित्र समूह है। इन मंदिरों का उल्लेख गणेश पुराण, मुद्गल पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है। 'अष्ट' अर्थात आठ और 'विनायक' गणेश का एक नाम। ये सभी मंदिर पुणे, अहमदनगर और रायगड जिलों में हैं और परस्पर 654 किलोमीटर के क्षेत्र में फैले हैं।
शास्त्रीय परंपरा के अनुसार अष्टविनायक दर्शन का क्रम:
१. मोरेश्वर (मोरगाँव) — यह यात्रा का प्रारंभिक और अंतिम दोनों मंदिर है। यहाँ से यात्रा शुरू होती है और समापन भी यहीं पर होता है। गणेश जी ने यहाँ त्रिपुरासुर का वध किया था।
२. सिद्धिविनायक (सिद्धटेक) — भीमा नदी के तट पर स्थित। गणपति की सूंड यहाँ दाहिनी ओर है — जो दुर्लभ है। भगवान विष्णु ने यहाँ तपस्या करके सिद्धि प्राप्त की।
३. बल्लालेश्वर (पाली) — गणेश जी का यह एकमात्र स्वरूप है जो किसी भक्त के नाम पर है।
४. वरदविनायक (महड) — यह वरदान देने वाले गणपति हैं। यहाँ अखंड दीप जलता रहता है।
५. चिंतामणि (थेऊर) — भक्तों की चिंता हरने वाले गणेश। माधवराव पेशवा इनके प्रबल भक्त थे।
६. गिरिजात्मज (लेण्याद्री) — पहाड़ी गुफाओं में स्थित एकमात्र गुफा-मंदिर। यहाँ माता पार्वती ने गणेश को जन्म दिया।
७. विघ्नहर (ओझर) — विघ्नासुर को पराजित करके यहाँ विराजित हुए। अष्टविनायकों में सबसे सम्पन्न मंदिर माना जाता है।
८. महागणपति (रांजणगाँव) — दस हाथों वाले विशाल स्वरूप। भगवान शिव ने त्रिपुरासुर से युद्ध से पहले यहाँ गणेश की आराधना की।
समापन — यात्रा का अंत पुनः मोरगाँव के मोरेश्वर मंदिर में दर्शन से होता है।
यात्रा का फल — यह पूरी यात्रा लगभग दो-तीन दिनों में पूर्ण होती है। यात्रा प्रारंभ करने से पहले संकल्प लेना और प्रत्येक मंदिर में श्रद्धाभाव से दर्शन करना फलदायी माना जाता है।





