विस्तृत उत्तर
बैसाखी (वैसाखी) वैशाख मास की संक्रांति (13-14 अप्रैल) को मनाई जाती है। यह सूर्य का मेष राशि प्रवेश = नववर्ष आरम्भ = रबी फसल कटाई का उत्सव है।
बैसाखी पूजा विधान
1. प्रातः स्नान: पवित्र नदी (विशेषतः गंगा, यमुना, सतलुज) या सरोवर में स्नान। बैसाखी पर स्नान अत्यंत पुण्यदायी।
2. सूर्य पूजा: सूर्य देव को जल अर्पित करें (ताम्बे के लोटे से)। 'ॐ सूर्याय नमः।' सूर्य मेष राशि में प्रवेश = नवीन ऊर्जा।
3. मन्दिर दर्शन: बैसाखी पर मन्दिर जाकर विशेष पूजा। उत्तर भारत में शिव-विष्णु मन्दिरों में विशेष आयोजन।
4. नवान्न पूजन (नई फसल): नई फसल (गेहूँ) के दाने भगवान को अर्पित करें — कृतज्ञता पूजा। पहला अन्न देवता को, फिर परिवार और गरीबों को।
5. दान: अन्नदान, वस्त्रदान, गौसेवा। बैसाखी पर दान विशेष पुण्यदायी। संक्रांति का दान = अक्षय फल।
6. सामूहिक भोजन: लंगर (सामूहिक भोज) की परम्परा — सभी जाति-वर्ग के लोग एक साथ बैठकर भोजन करें।
7. मेला और उत्सव: बैसाखी मेला, भांगड़ा-गिद्धा नृत्य, लोकगीत।
हिन्दू परम्परा में बैसाखी: यह सौर नववर्ष (मेष संक्रांति) है। तमिलनाडु में 'पुथंडु', बंगाल में 'पोइला बैसाख', असम में 'बिहू' — सभी इसी समय मनाए जाते हैं।
विशेष: सिख धर्म में बैसाखी 1699 में गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा खालसा पंथ स्थापना दिवस है — इसलिए सिख बन्धुओं के लिए इसका विशेष धार्मिक महत्व है।





