विस्तृत उत्तर
धुन्धुकारी के पाप इतने भयंकर थे कि गया श्राद्ध से भी उसे मुक्ति नहीं मिली। अंततः सूर्यदेव के निर्देश पर गोकर्ण ने सात दिनों तक श्रीमद्भागवत पुराण का पारायण, अर्थात सप्ताह ज्ञान यज्ञ, किया। धुन्धुकारी का प्रेत एक सात-गांठों वाले बांस में प्रवेश कर गया। भागवत कथा के प्रभाव से प्रतिदिन बांस की एक गांठ फटती गई, और सातवें दिन धुन्धुकारी प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य रूप धारण कर वैकुंठ धाम को चला गया। यह आख्यान सिद्ध करता है कि घोर पापी प्रेत बनते हैं और भागवत श्रवण जैसे पुण्य कर्म से उनकी मुक्ति संभव है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





