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भागवत (5.24.16) श्लोक का तात्विक अर्थ क्या है?

भागवत (5. 24. 16) का तात्विक अर्थ — भौतिक भोग (हाटक रस) व्यक्ति में मिथ्या अहंकार जगाता है।

संक्षिप्त उत्तर

भागवत (5.24.16) का तात्विक अर्थ — भौतिक भोग (हाटक रस) व्यक्ति में मिथ्या अहंकार जगाता है। वह ईश्वर समझने लगता है जबकि यह आत्मज्ञान का सबसे बड़ा पतन है।

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विस्तृत उत्तर

श्रीमद्भागवत (5.24.16) का यह श्लोक — या वै बिलायनं प्रविष्टं पुरुषं रसेन हाटकाख्येन साधयित्वा स्वविलासावलोकनानुरागस्मितसंलापोपगूहनादिभिः स्वैरं किल रमयन्ति यस्मिन्नुपयुक्ते पुरुष ईश्वरोऽहं सिद्धोऽहमित्ययुतमहागजबलमात्मानमभिमन्यमानः कत्थते मदान्ध इव — अत्यंत गहरा तात्विक संदेश देता है। यह श्लोक भौतिकवाद और मिथ्या अहंकार की सबसे बड़ी समस्या को उजागर करता है। जब जीव हाटक रस (भौतिक भोग, धन, शक्ति) का सेवन करता है तो वह स्वयं को ईश्वर समझने लगता है। दस हजार हाथियों का बल एक प्रतीक है — भौतिक शक्ति और संपदा का भ्रम। यह प्रसंग भगवद्गीता के उस सत्य को दर्शाता है कि जो जीव अहंकार में डूब जाता है वह अपनी वास्तविक पहचान (परमात्मा का अंश होने के तथ्य) को भूल जाता है।

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भागवत (5.24.16) श्लोक का तात्विक अर्थ क्या है को संदर्भ सहित समझें

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