विस्तृत उत्तर
भगवान शिव वितल लोक में हाटकेश्वर स्वरूप में प्रजापति ब्रह्मा की सृष्टि की वृद्धि करने के उद्देश्य से माता भवानी के साथ निवास करते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान भव और भवानी वितल लोक में मिथुनीभूत होकर दिव्य क्रीड़ा में मग्न रहते हैं। यह साधारण दैहिक मिलन नहीं है, बल्कि प्रकृति और पुरुष की वह आदिम ब्रह्मांडीय ऊर्जा है जो संपूर्ण चराचर जगत को प्राणशक्ति और प्रजनन क्षमता प्रदान करती है। वितल लोक ब्रह्मांड का वह केंद्र है जहाँ सृजन की यह सघन ऊर्जा घनीभूत होती है। असुरों के इस लोक में भगवान शिव की उपस्थिति यह प्रमाणित करती है कि ब्रह्मांड का कोई भी कोना, चाहे वह घोर भौतिकता और तमोगुण से परिपूर्ण क्यों न हो, ईश्वर की सत्ता और उनकी नियंत्रण शक्ति से मुक्त नहीं है।
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