विस्तृत उत्तर
भूलोक के ठीक नीचे के सात अधोलोक (अतल, वितल, सुतल आदि) सूर्य के प्रकाश से वंचित हैं किन्तु वहाँ सर्पों के मणियों का अलौकिक प्रकाश रहता है। वहाँ असुर, नाग एवं दानव भौतिक ऐश्वर्य का भोग करते हैं जो स्वर्ग के समान ही है। तथापि वहाँ आध्यात्मिक उन्नति या आत्म-साक्षात्कार का कोई मार्ग नहीं है। इसके कई कारण हैं। पहला — वे विशुद्ध रूप से भौतिक भोग के लोक हैं जहाँ जीव अहंकार और माया में डूबे रहते हैं। दूसरा — वहाँ सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँचता और सूर्य ज्ञान, विवेक और चेतना का प्रतीक है। तीसरा — वहाँ के निवासी (असुर, नाग, दानव) भौतिक सुखों में इतने लिप्त रहते हैं कि उनमें वैराग्य और मुमुक्षा उत्पन्न ही नहीं होती। यही भूलोक की सबसे बड़ी विशेषता है जो इसे चौदह भुवनों में सर्वोपरि बनाती है — यहाँ दुःख और सुख का वह संतुलित मिश्रण है जो वैराग्य, ज्ञान और परब्रह्म की प्राप्ति की तीव्र इच्छा को जन्म देता है।
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