विस्तृत उत्तर
विष्णु पुराण के द्वितीय अंश में महर्षि पराशर स्पष्ट रूप से बताते हैं कि जम्बूद्वीप के अन्य आठ वर्ष केवल भोगभूमियाँ हैं जहाँ पूर्वजन्म के पुण्यों का भोग किया जाता है किन्तु केवल भारतवर्ष ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की एकमात्र कर्मभूमि है। जीव अपने श्रेष्ठ कर्मों से स्वर्ग प्राप्त करता है और दुष्कर्मों से नर्क में जाता है किंतु नए कर्म करने की स्वतंत्रता और जन्म-मरण के चक्र से पूर्ण मोक्ष (अपवर्ग) प्राप्ति का अधिकार उसे केवल भारतवर्ष की भूमि पर मानव देह प्राप्त होने पर ही मिलता है। गरुड़ पुराण के अनुसार भी जीव चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात् जब उसके पाप और पुण्य का संतुलन होता है तब उसे यह दुर्लभ मनुष्य शरीर भारत भूमि पर प्राप्त होता है। इस भूमि पर जन्म लेना हज़ारों जन्मों के पुण्यों का एकत्रीकरण है।
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