विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत पुराण (५.२४.५) का श्लोक 'यावद्वायु: प्रवाति यावन्मेघा उपलभ्यन्ते' — जहाँ तक वायु बहती है और जहाँ तक बादल देखे जाते हैं वहाँ तक अंतरिक्ष है — आधुनिक विज्ञान के उस तथ्य की भी वैदिक पुष्टि करता है कि पृथ्वी के वायुमंडल (Atmosphere) की एक निश्चित सीमा है जिसके पार निर्वात (Vacuum) या वायुहीन अंतरिक्ष है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार पृथ्वी का वायुमंडल लगभग 100 किलोमीटर (कर्मन रेखा) तक है जिसके ऊपर वायु नहीं होती। पुराणों में कहा गया है कि जहाँ तक वायु बहती है और बादल दिखते हैं वह भुवर्लोक का निचला और मध्य भाग है। यह समानता इस बात का संकेत देती है कि वैदिक ऋषियों को ब्रह्मांड की भौतिक संरचना का गहन ज्ञान था।
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