विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत पुराण (२.५.३९) में शुकदेव गोस्वामी के श्लोक में ब्रह्मलोकः सनातनः का उल्लेख है। इसका अर्थ समझने में आचार्यों ने विशेष ध्यान दिया है। शुकदेव (२.५.३९) इस बात का स्पष्ट विभेदन करते हैं कि कभी-कभी ब्रह्मलोक शब्द का प्रयोग शाश्वत वैकुण्ठ (आध्यात्मिक आकाश) के लिए भी किया जाता है। श्रील जीव गोस्वामी और अन्य वैष्णव आचार्यों ने स्पष्ट किया है कि श्लोक में आये ब्रह्मलोकः सनातनः का तात्पर्य उस सनातन वैकुण्ठ से है जो सत्यलोक के पार स्थित है न कि भौतिक सत्यलोक से। श्रीमद्भागवत के अनुसार सत्यलोक (जो भौतिक ब्रह्माण्ड के भीतर है) शाश्वत नहीं है जबकि सनातन ब्रह्मलोक शाश्वत है। यह विभेद अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सत्यलोक और वैकुण्ठ के अंतर को स्पष्ट किया जाता है।
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