विस्तृत उत्तर
सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी ने सृष्टि विस्तार का कार्य शुरू किया। सबसे पहले उनके मन से पाँच प्रकार की अविद्या उत्पन्न हुई: तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र। अपनी इस अज्ञानयुक्त सृष्टि को देखकर ब्रह्मा जी असंतुष्ट हुए। तब उन्होंने अपने मन को शुद्ध करने के लिए भगवान नारायण के चरणकमलों का ध्यान किया। उस गहन भगवद्-ध्यान और विशुद्ध संकल्प के प्रभाव से ब्रह्मा जी के मन से चार अत्यंत तेजस्वी, दिव्य और मुक्त आत्माएँ प्रकट हुईं, जिन्हें कुमार कहा गया। ये सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार थे।
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