विस्तृत उत्तर
दक्षिण दिशा में मुख करने का कारण शास्त्रों में स्पष्ट रूप से निर्धारित है। शास्त्रीय आधार के अनुसार श्राद्ध कर्म के दौरान देव कार्य पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके किए जाते हैं, परंतु पितृ कार्य करते समय कर्ता का मुख अनिवार्य रूप से दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए, क्योंकि शास्त्रों में दक्षिण दिशा को यमलोक और पितृलोक की दिशा माना गया है।
इसके मुख्य कारण कई हैं। पहला कारण यह है कि दक्षिण दिशा यमलोक की दिशा है। शास्त्रों में दक्षिण दिशा यमलोक की दिशा मानी गई है, और यम मृत्यु के देवता हैं। मृत्यु के बाद आत्मा यमलोक के माध्यम से आगे जाती है। दूसरा कारण यह है कि दक्षिण दिशा पितृलोक की दिशा भी है। शास्त्रों में दक्षिण दिशा पितृलोक की दिशा मानी गई है, क्योंकि पितर पितृलोक में निवास करते हैं, और वह लोक दक्षिण दिशा में स्थित है। तीसरा कारण यह है कि दक्षिण दिशा पितरों के आगमन की दिशा है। वायु पुराण और अन्य संहिताओं के अनुसार, इस पवित्र काल में हमारे पूर्वज चंद्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा से अपने मृत्यु लोक के घर के द्वार पर वायु रूप में उपस्थित होते हैं।
इन तीनों कारणों का सारांश यह है कि दक्षिण दिशा यमलोक की दिशा है, पितृलोक की दिशा है, और पितरों के आगमन की दिशा है। तीनों मिलकर सिद्ध करते हैं कि दक्षिण पितरों से सीधा संपर्क की दिशा है। विभिन्न दिशाओं का अपना-अपना महत्व है। पूर्व दिशा सूर्योदय की दिशा है और देव कार्य के लिए है। उत्तर दिशा शुभ कार्यों की दिशा है और देव कार्य के लिए है। दक्षिण दिशा यमलोक और पितृलोक की दिशा है, जो केवल पितृ कार्य के लिए है। पश्चिम दिशा कुछ विशेष कार्यों के लिए है।
इस व्यवस्था के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण है लोक-दिशा संबंध, अर्थात् हर लोक की एक निर्धारित दिशा होती है, और उस लोक के निवासियों से संपर्क उसी दिशा से होता है। दूसरा कारण है ऊर्जा प्रवाह, क्योंकि दक्षिण दिशा से पितरों की ऊर्जा आती है, और मुख दक्षिण की ओर रखने से ऊर्जा का सीधा प्रवाह होता है। तीसरा कारण है मंत्र-शक्ति, क्योंकि दक्षिण की ओर मुख करके बोले गए मंत्र सीधे पितृलोक तक पहुँचते हैं।
यहाँ अनिवार्य रूप से शब्द का विशेष महत्व है। शास्त्रों ने इसे अनिवार्य कहा है, यह वैकल्पिक नहीं है, और गलत दिशा का अर्थ श्राद्ध अधूरा है। व्यावहारिक प्रभाव के अनुसार सही दिशा से पितर तक संदेश पहुँचता है, और गलत दिशा से श्राद्ध फलहीन हो जाता है। शास्त्रीय स्रोत के रूप में वायु पुराण, आश्वलायन गृह्यसूत्र, गरुड़ पुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति इसका प्रमाण देते हैं। यह सूक्ष्म नियम सिद्ध करता है कि सनातन धर्म में दिशा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भी है, और हर लोक की अपनी दिशा होती है। निष्कर्षतः दक्षिण दिशा में मुख इसलिए करते हैं क्योंकि शास्त्रों में दक्षिण दिशा को यमलोक और पितृलोक की दिशा माना गया है, साथ ही पितर भी दक्षिण दिशा से ही चंद्रलोक के माध्यम से वायु रूप में आते हैं, इसलिए श्राद्ध में पितरों से सीधा संपर्क इसी दिशा से होता है।
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