विस्तृत उत्तर
बंगाल में दीपावली पर लक्ष्मी पूजा के बजाय (या साथ में) माँ काली की पूजा (श्यामा पूजा) की परम्परा है। इसके पीछे गहन धार्मिक और सांस्कृतिक कारण हैं:
1. अमावस्या = काली का समय: दीपावली कार्तिक अमावस्या को मनाई जाती है। अमावस्या = अंधकार का चरम। माँ काली अंधकार/तमस को नष्ट करने वाली शक्ति हैं। 'काली' शब्द 'काल' (समय/अंधकार) से बना है — वे काल (अंधकार/अज्ञान) को नष्ट करती हैं।
2. तांत्रिक परम्परा: बंगाल शाक्त-तांत्रिक परम्परा का प्रमुख केन्द्र रहा है। शाक्त पूजा में काली सर्वोच्च देवी हैं। कार्तिक अमावस्या तांत्रिक साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ रात्रि मानी गई है।
3. रामकृष्ण परमहंस प्रभाव: 19वीं शताब्दी में रामकृष्ण परमहंस की दक्षिणेश्वर काली मंदिर में साधना से काली भक्ति को और बल मिला। उनकी शिक्षाओं ने बंगाल में काली पूजा को जनमानस में गहराई से स्थापित किया।
4. लक्ष्मी = काली का ही रूप: शाक्त दर्शन में लक्ष्मी और काली दोनों आदिशक्ति के ही रूप हैं। बंगाल में दीपावली पर काली पूजा = आदिशक्ति की ही उपासना = लक्ष्मी पूजा से भिन्न नहीं, बल्कि शक्ति के मूल स्वरूप की पूजा।
5. दक्षिण कोलकाता परम्परा: कोलकाता के कालीघाट और दक्षिणेश्वर मंदिर — काली पूजा के प्रमुख केन्द्र। यहाँ दीपावली की रात भव्य काली पूजा होती है।
काली पूजा विधि (संक्षिप्त): मध्यरात्रि (निशीथ काल) में पूजा। काली यंत्र/प्रतिमा पर लाल पुष्प (जबा/गुड़हल), सिन्दूर, मिठाई भोग। 'ॐ क्रीं काल्यै नमः' मंत्र। दक्षिणा काली स्तोत्र पाठ।
विशेष: बंगाल में दीपावली पर काली पूजा और लक्ष्मी पूजा दोनों होती हैं — कई परिवार लक्ष्मी पूजा अलग से कोजागरी पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) पर करते हैं।





