विस्तृत उत्तर
दीपावली पर दीपक जलाने की संख्या और स्थान का विशेष महत्व है। तेरह दीपक की परम्परा अत्यंत प्राचीन और शुभ मानी गई है।
तेरह दीपक के स्थान
- 1पूजा स्थल: मुख्य लक्ष्मी-गणेश पूजा के पास।
- 2मुख्य द्वार (दोनों ओर): घर के प्रवेश द्वार पर — लक्ष्मी के स्वागत हेतु।
- 3देहली (चौखट): दरवाजे की देहली पर।
- 4तुलसी क्यारी: तुलसी के पास — तुलसी माता = लक्ष्मी स्वरूप।
- 5रसोई: अन्नपूर्णा देवी हेतु।
- 6तिजोरी/गल्ला: कुबेर पूजन स्थल।
- 7जल स्रोत (कुआँ/हैंडपम्प/नल): जल देवता हेतु।
- 8गोशाला/पशु स्थान: गोमाता/पशुधन हेतु।
- 9पीपल/बरगद वृक्ष: वृक्ष देवता हेतु।
- 10चौराहा/गली: दक्षिण दिशा में यमराज हेतु (अकाल मृत्यु निवारण)।
- 11छत/अटारी: आकाश दीपक — पितरों के मार्गदर्शन हेतु।
- 12शौचालय के बाहर: स्वच्छता की देवी हेतु (अंधेरे कोनों से नकारात्मकता दूर)।
- 13अन्न भण्डार/कोठी: अन्न-धन्य की रक्षा हेतु।
दीपक नियम
- ▸तिल तेल या सरसों तेल के दीपक सर्वोत्तम। घी का दीपक पूजा स्थल पर।
- ▸मिट्टी के दीपक (दीये) का प्रयोग करें — प्लास्टिक/धातु के नहीं।
- ▸दीपक की लौ दक्षिण दिशा की ओर न हो (यमराज दीपक को छोड़कर)।
- ▸रात भर दीपक जलते रहने चाहिए — बुझ जाए तो अशुभ माना जाता है।
यमराज दीपक (विशेष): दक्षिण दिशा में (घर के बाहर) एक दीपक यमराज के नाम से जलाया जाता है — यह अकाल मृत्यु से रक्षा और पितरों की शांति हेतु है। इसे धनतेरस की शाम को भी जलाने का विधान है।
ध्यान दें: दीपकों की संख्या 7, 11, 13, 21 या इससे अधिक — परिवार की परम्परा अनुसार। विषम संख्या शुभ मानी जाती है।





