विस्तृत उत्तर
वेदान्त दर्शन, विशेषकर आदि शंकराचार्य के ब्रह्मसूत्र भाष्य और छान्दोग्य तथा बृहदारण्यक उपनिषदों में सत्यलोक की यात्रा को देवयान मार्ग (देवताओं का मार्ग) के रूप में समझाया गया है। जब कोई सगुण-ब्रह्म का उपासक या ऊर्ध्वरेता संन्यासी मृत्यु को प्राप्त होता है तो उसकी आत्मा सुशुम्ना नाड़ी से होकर शरीर से बाहर निकलती है। देवयान मार्ग से वह सर्वप्रथम अर्चिस (प्रकाश या अग्नि) के देवता के लोक में जाती है, वहाँ से दिन के देवता, फिर शुक्ल पक्ष के देवता, फिर उत्तरायण के छः महीनों के देवताओं के लोक में पहुँचती है। इसके पश्चात देवलोक, वायु लोक, वरुण लोक, इन्द्र लोक और प्रजापति के लोकों को पार करते हुए विद्युत लोक में पहुँचती है जहाँ से एक अमानव पुरुष उसे सत्यलोक ले जाता है।
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