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विस्तृत उत्तर
वे मनुष्य जो अपने जीवन में धन संचय की अपार लालसा रखते हैं और मृत्यु के समय भी जिनका ध्यान अपनी तिजोरी या संपत्ति में अटका रहता है, वे मृत्यु के पश्चात यक्ष या यक्षिणी बनते हैं। यक्षों को पृथ्वी में छिपे खजानों का रक्षक माना जाना इसी कर्म का प्रतीक है। यक्ष योनि पूर्णतः पापी अवस्था नहीं है, परंतु इसमें धन, विलासिता और भौतिक संपदा के प्रति तीव्र रजोगुणी आसक्ति स्पष्ट दिखाई देती है।
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