विस्तृत उत्तर
धनतेरस (कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी) पर यमराज के लिए दीपक जलाने की परम्परा अत्यंत प्राचीन और शास्त्रसम्मत है। इसे 'यम दीपदान' या 'यम के लिए दीपक' कहते हैं।
पौराणिक कथा
कथा के अनुसार राजा हेम का 16 वर्षीय पुत्र था जिसकी कुंडली में विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से मृत्यु लिखी थी। पत्नी ने उस रात्रि पति के कक्ष के द्वार पर सोने-चाँदी के आभूषणों का ढेर लगाया और अनगिनत दीपक जलाए तथा कथा-गीत सुनाते हुए जागती रही। जब यमराज सर्प रूप में आए तो दीपकों की चकाचौंध और गीतों से मोहित होकर रातभर बैठे रहे और सुबह बिना प्राण लिए लौट गए। इसीलिए धनतेरस को 'यमदीपदान' का विधान है।
यम दीपक जलाने की विधि
- 1संध्याकाल में घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके एक दीपक जलाएँ।
- 2दीपक में तिल का तेल और चार बत्तियाँ होनी चाहिए (कुछ परम्पराओं में एक बत्ती)।
- 3दीपक को जमीन पर (ऊँचे स्थान पर नहीं) रखें।
- 4मंत्र: 'मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम।' (यमराज मुझ पर प्रसन्न हों।)
- 5दीपक रात भर जलता रहना चाहिए। पीछे मुड़कर न देखें।
यम दीपदान का उद्देश्य
- ▸अकाल मृत्यु से रक्षा।
- ▸परिवार के सदस्यों की दीर्घायु कामना।
- ▸यमराज की कृपा प्राप्ति।
- ▸पितरों को प्रकाश और शांति।
विशेष: यह एकमात्र अवसर है जब यमराज की सीधी पूजा/दीपदान किया जाता है। इस दीपक को 'यमराज दीपक' या 'यम का दीया' कहते हैं। धनतेरस को 'धन्वन्तरि त्रयोदशी' और 'यमदीपदान' दोनों नामों से जाना जाता है।





