विस्तृत उत्तर
गोकर्ण ने धुन्धुकारी के लिए गया तीर्थ में श्राद्ध किया था, परंतु धुन्धुकारी के पाप इतने भयंकर थे कि गया श्राद्ध से भी उसे मुक्ति नहीं मिली। धुन्धुकारी जीवन भर महापापी, दुराचारी, हिंसक और चोर रहा था। उसने माता-पिता को प्रताड़ित किया, पांच वेश्याओं के साथ रहा, चोरी की और अंत में अत्यंत हिंसक अकाल मृत्यु पाई। इन घोर पापों के कारण वह भयंकर प्रेत बन गया था। अंततः सूर्यदेव के निर्देश पर गोकर्ण ने सात दिनों तक श्रीमद्भागवत पुराण का पारायण किया, जिसके प्रभाव से उसे प्रेत योनि से मुक्ति मिली।
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