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विस्तृत उत्तर
द्वैत की शुरुआत तब हुई जब एकसूत्रीय और अखंड अवस्था में गति आई। महाप्रलय में सब कुछ एक कारण रूप में था, जहाँ प्रकाश-अंधकार, सुख-दुख या ऊपर-नीचे जैसा भेद नहीं था। विष्णु की प्रथम श्वास और ब्रह्मांडीय मंथन से विभाजन शुरू हुआ। इसी विभाजन से प्रकाश और अंधकार, अग्नि और जल, दिशा और स्थान जैसी द्वैत अवस्थाएँ प्रकट हुईं।
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