विस्तृत उत्तर
संध्या काल (सूर्यास्त के समय) मुख्य द्वार पर दीपक जलाना सनातन धर्म की अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण परंपरा है।
शास्त्रीय कारण
- 1संध्या वंदन — सूर्यास्त का समय संधि काल (दिन और रात का मिलन) है। इस समय देवताओं और पितरों दोनों का आह्वान होता है। दीपक इस संधि काल की शुभ ज्योति है।
- 1लक्ष्मी आगमन — लोक परंपरा और कुछ पौराणिक मान्यताओं के अनुसार संध्या काल में लक्ष्मी जी विचरण करती हैं। जिस घर में ज्योति जलती है, वहां लक्ष्मी प्रवेश करती हैं।
- 1अंधकार निवारण — दीपक अंधकार (अज्ञान, नकारात्मकता) को दूर करता है। 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' (बृहदारण्यक उपनिषद) — अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाओ।
- 1पितृ तर्पण — संध्या काल में पितरों का स्मरण होता है। दीपक उन्हें मार्ग दिखाता है।
व्यावहारिक कारण
- ▸प्राचीन काल में विद्युत नहीं थी। द्वार पर दीपक घर आने वालों को मार्ग दिखाता था।
- ▸कीट-पतंगों को आकर्षित कर घर के अंदर जाने से रोकता था।
दीपक जलाने की विधि
- 1सूर्यास्त से थोड़ा पहले या ठीक सूर्यास्त पर जलाएं।
- 2घी या सरसों तेल का दीपक।
- 3मुख्य द्वार की दहलीज पर या द्वार के दोनों ओर रखें।
- 4पूजा स्थल में भी संध्या दीप जलाएं।
- 5तुलसी के पौधे के पास भी दीपक जलाना शुभ है।
दीप मंत्र
शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते।।





