विस्तृत उत्तर
गोपीचंदन वैष्णव संप्रदाय का एक अत्यंत पवित्र तिलक है जिसका धार्मिक और पौराणिक महत्व विशेष है।
गोपीचंदन क्या है — यह द्वारका (गुजरात) के निकट स्थित गोपी सरोवर की पवित्र मिट्टी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन छोड़कर द्वारका जाने का निर्णय किया, तो गोपियों ने विरह में अपने प्राण त्याग दिए और उनके शरीर उस सरोवर के तट पर मिट्टी बन गए। उसी पवित्र मिट्टी को गोपीचंदन कहते हैं। इसे 'हरिचंदन' भी कहा जाता है।
गोपीचंदन कैसे लगाएँ — गोपीचंदन की छड़ी या टुकड़े को जल में भिगोकर थोड़ा घिसें और हल्का पेस्ट बनाएँ। वैष्णव परंपरा में यह ऊर्ध्वपुंड्र के रूप में लगाया जाता है — माथे पर दो ऊर्ध्व (ऊपर की ओर) समानांतर रेखाएँ खींची जाती हैं जो भगवान विष्णु के चरण-पादुका का प्रतीक हैं। इन दो रेखाओं के बीच में एक लाल या पीले रंग की रेखा होती है जो माता लक्ष्मी का प्रतीक है।
सामान्य भक्त गोपीचंदन का सरल गोलाकार तिलक भी माथे पर लगा सकते हैं। मान्यता है कि गोपीचंदन का तिलक लगाने से राधाकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है, माथे पर तेज बनता है और बृहस्पति ग्रह का बल बढ़ता है।



