विस्तृत उत्तर
ग्रहण काल (सूर्य या चन्द्र ग्रहण) को शास्त्रों में पुण्यकाल माना गया है — इस समय किया गया जप-दान करोड़ गुना फल देता है।
ग्रहण काल में जप-पूजा विधि
- 1स्नान: ग्रहण स्पर्श (आरम्भ) होते ही स्नान करें।
- 1जप (सर्वश्रेष्ठ कर्म): ग्रहण काल में मंत्र जप सर्वोत्तम कर्म है। इस समय का जप लाखों गुना फल देता है।
- 1कौन सा मंत्र जपें:
- ▸सूर्य ग्रहण में: 'ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः' या गायत्री मंत्र।
- ▸चन्द्र ग्रहण में: 'ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः' या महामृत्युंजय मंत्र।
- ▸सभी ग्रहणों में: अपने इष्ट देवता मंत्र, गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय, विष्णु सहस्रनाम।
- 1मूर्ति पूजा: कुछ परम्पराओं में ग्रहण काल में मूर्ति पूजा वर्जित मानी जाती है — केवल मानसिक पूजा और जप करें। किन्तु अन्य परम्पराओं में पूजा शुभ मानी गई है।
- 1ग्रहण मोक्ष (समाप्ति) पर: ग्रहण समाप्त होने पर पुनः स्नान → दान → पूजा → भोजन।
- 1तुलसी पत्र: ग्रहण से पूर्व भोजन पदार्थों में तुलसी पत्र डाल दें — भोजन अशुद्ध नहीं होता।
विशेष: गर्भवती स्त्रियों को ग्रहण काल में विशेष सावधानी रखनी चाहिए (अलग प्रश्न में विस्तार)। ग्रहण काल में सोना नहीं चाहिए — जागकर जप करना उत्तम।





