विस्तृत उत्तर
देवराज इन्द्र की राजसभा का नाम 'सुधर्मा' है। इसे कभी-कभी 'पुष्कर-मालिनी' भी कहा जाता है। यह राजसभा अमरावती नगरी के मध्य में स्थित है जहाँ से संपूर्ण स्वर्लोक और अन्य लोकों का प्रशासनिक संचालन होता है। महाभारत के सभा पर्व (अध्याय 7) में देवर्षि नारद द्वारा धर्मराज युधिष्ठिर को इन्द्र की राजसभा का जो सजीव और अत्यंत विस्तृत वर्णन दिया गया है वह स्वर्लोक के प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक स्वरूप को स्पष्ट करता है। नारद जी के अनुसार इन्द्र की यह तेजोमयी दिव्य सभा सूर्य के समान प्रकाशित होती है। देवराज इन्द्र ने सौ यज्ञों (शतक्रतु) का अनुष्ठान पूर्ण करके अपने तपोबल से इस सभा पर विजय प्राप्त की थी। यह सभा ब्रह्मांड के शासन, न्याय और यज्ञों के फल-वितरण का सर्वोच्च केंद्र है।
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