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शिव पूजा📜 शिव पुराण, स्कंद पुराण (काशी खंड), देवी भागवत, वाल्मीकि रामायण2 मिनट पठन

जलाभिषेक में गंगाजल का महत्व क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

गंगाजल महत्त्व: गंगा = शिव-जटा-विनिर्गता (शिव के माथे से उतरी)। स्कंद पुराण: गंगाजल अभिषेक से सर्व-जन्म-पाप नाश। पितृ-मोक्ष। देवी भागवत: 68 तीर्थों का फल। काशी में विश्वनाथ पर गंगाजल = मोक्ष। गंगाजल न हो तो शुद्ध जल में कुछ बूँदें मिलाएँ।

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विस्तृत उत्तर

गंगाजल को शिवाभिषेक में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है — इसके कारण शास्त्रों में बहुत स्पष्ट हैं।

गंगा और शिव का अभिन्न संबंध

वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड): भगीरथ की तपस्या से गंगा स्वर्ग से उतरी, किंतु उनके वेग को थामने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया। इसीलिए गंगा को 'जाह्नवी' और 'शिव-जटा-विनिर्गता' कहा जाता है। गंगा सर्वप्रथम शिव के माथे पर थीं — वे शिव की अर्धांगिनी हैं।

गंगाजल के विशेष गुण

1सर्व-पापनाशिनी

स्कंद पुराण (काशी खंड): 'गंगाजलं परं तीर्थं...' — गंगाजल से शिवाभिषेक करने पर सभी जन्मों के पाप नष्ट होते हैं।

2पितृ-मोक्ष

गंगाजल से शिवाभिषेक करने पर पितरों को मोक्ष मिलता है — यह श्राद्ध-कर्म जितना फलदायक।

3सर्व-तीर्थ-फल

देवी भागवत: गंगाजल = सभी 68 तीर्थों का संयुक्त फल।

4काशी में विशेष महत्त्व

काशी विश्वनाथ पर गंगाजल अभिषेक = सर्वोच्च पुण्य — मोक्ष-प्रदायक।

व्यावहारिक: यदि गंगाजल उपलब्ध न हो, तो शुद्ध जल में गंगाजल की कुछ बूँदें मिलाकर उपयोग किया जा सकता है।

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शास्त्रीय स्रोत
शिव पुराण, स्कंद पुराण (काशी खंड), देवी भागवत, वाल्मीकि रामायण
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