विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म की ज्ञान-गंगा में, ईश्वर तक पहुँचने के अनगिनत मार्ग वर्णित हैं, जिनमें 'जप' को एक अत्यंत सरल, सुगम और शक्तिशाली सोपान माना गया है। यह एक ऐसी साधना है जिसमें भक्त अपने इष्टदेव के नाम या मंत्र का निरंतर स्मरण करता है, और इस पवित्र अनुष्ठान में उसका सबसे निष्ठावान साथी होती है — जपमाला।
सामान्य दृष्टि से देखने पर यह केवल मनकों की एक लड़ी प्रतीत हो सकती है, जिसका उपयोग मंत्रों की गिनती के लिए किया जाता है। परन्तु, शास्त्रों की दृष्टि से यह एक साधारण गणना-यंत्र नहीं, अपितु एक अत्यंत शक्तिशाली एवं दिव्य आध्यात्मिक उपकरण है। यह साधक और साध्य के मध्य एक सेतु है, शक्ति-स्वरूपा है और ऊर्जा की संवाहक है।
जपमाला का प्रत्येक अंग — उसके मनकों की संख्या, उनके मध्य की ग्रंथि, उसका शीर्ष-मनका 'सुमेरु' और उसे धारण करने की विधि — सब कुछ गहन शास्त्रीय विधानों पर आधारित है। आगम शास्त्रों, पुराणों और तंत्र ग्रंथों में इसका विस्तृत विवेचन मिलता है।





