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विस्तृत उत्तर
शास्त्रों में प्रेत को मांस की आवश्यकता का उल्लेख मिलता है, परंतु कलियुग में यह वर्जित है। इसलिए मांस के स्थान पर केले या अन्य सात्त्विक द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है। यह विधान प्रेत की तृप्ति से जुड़ा है, विशेषकर ग्यारहवें और बारहवें दिन के अन्न, जल और दीपदान के संदर्भ में।
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