विस्तृत उत्तर
भागवत पुराण और भगवद्गीता में कर्मकांडी और ब्रह्मज्ञानी के स्वर्लोक के प्रति दृष्टिकोण में मूलभूत अंतर बताया गया है। कर्मकांडी (Karmis) केवल स्वर्लोक तक जाने की कामना करते हैं जहाँ वे इन्द्र के समान ऐश्वर्य भोग सकें। वे यज्ञों के माध्यम से स्वर्लोक को अंतिम लक्ष्य मानते हैं। उनके लिए स्वर्ग का ऐश्वर्य — अमरावती की सुंदरता, कल्पवृक्ष, अप्सराएं और देव-जीवन — ही परम उपलब्धि है। इसके विपरीत ब्रह्मज्ञानी (Jnanis) और अनन्य भक्त इस स्वर्गिक सुख को भी 'नरक' के समान अस्थायी मानते हैं क्योंकि यहाँ से पतन निश्चित है। भागवत पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि अद्वैत वेदांत और शुद्ध भक्ति के मार्ग पर चलने वाले साधक स्वर्लोक की कामना नहीं करते। वे सीधे मोक्ष या भगवान के परम धाम की कामना करते हैं जहाँ से वापसी नहीं होती।
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