विस्तृत उत्तर
विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण के अंतर्गत, लक्ष्मी और नारायण (विष्णु) को दो पृथक या स्वतंत्र सत्ताएँ नहीं माना गया है। वे एक ही परम सत्य के दो अविभाज्य पहलू हैं। शिव और शक्ति के समान ही, यहाँ विष्णु और लक्ष्मी के मध्य शक्ति और शक्तिमान का अद्वैत दर्शन प्रस्तुत किया गया है।
विष्णु पुराण के प्रथम अंश के आठवें अध्याय में महर्षि पराशर ने अपने शिष्य मैत्रेय मुनि को लक्ष्मी और नारायण के शाश्वत (नित्य) और अभेद संबंध का अत्यंत गूढ़ ज्ञान दिया है। महर्षि कहते हैं: 'नित्यैवैषा जगन्माता विष्णोः श्रीरनपायिनी। यथा सर्वगतो विष्णुस्तथैवेयं द्विजोत्तम।।' (विष्णु पुराण 1.8.17)
इस श्लोक का अर्थ है कि हे द्विजोत्तम! जगन्माता लक्ष्मी भगवान विष्णु की नित्य सहचरी हैं और वे कभी भी विष्णु का संग नहीं छोड़तीं। जिस प्रकार भगवान विष्णु सर्वव्यापी और सर्वगत हैं, उसी प्रकार देवी लक्ष्मी भी सर्वव्यापी हैं।
महर्षि पराशर अत्यंत विस्तार से समझाते हैं कि भगवान विष्णु पुरुष तत्त्व (विशुद्ध चेतना) हैं और लक्ष्मी स्त्री तत्त्व (क्रियाशील ऊर्जा) हैं। दोनों के मध्य का संबंध अग्नि और उसकी उष्णता के समान है; जिस प्रकार अग्नि से उसकी गर्मी को अलग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार विष्णु से लक्ष्मी को पृथक नहीं किया जा सकता।





