विस्तृत उत्तर
जब द्वि-परार्ध काल (ब्रह्मा जी के जीवन के 100 दिव्य वर्ष) पूर्ण हो जाते हैं और प्राकृतिक महाप्रलय घटित होती है तब स्वयं सत्यलोक भी नष्ट हो जाता है। उस चरम समय में भगवान ब्रह्मा तथा वहाँ उपस्थित सभी ज्ञानवान और पूर्णतः सिद्ध आत्माएँ अपने सूक्ष्म शरीरों को त्याग कर विशुद्ध चिन्मय (आध्यात्मिक) शरीर धारण करती हैं। तत्पश्चात वे भौतिक आवरणों को पार करते हुए उस परम सनातन लोक में प्रवेश करते हैं जिसे वैकुण्ठ, गोलोक या वास्तविक शाश्वत ब्रह्मलोक कहा गया है जो सत्यलोक से दो करोड़ बासठ लाख योजन ऊपर स्थित है और जो प्रलय की अग्नि से सर्वथा मुक्त है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





