विस्तृत उत्तर
जब द्वि-परार्ध काल (ब्रह्मा जी के जीवन के 100 दिव्य वर्ष) पूर्ण हो जाते हैं तब प्राकृतिक महाप्रलय घटित होती है। इस प्राकृतिक महाप्रलय के समय भौतिक प्रकृति अपने मूल स्वरूप में लौट आती है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार के आवरणों से युक्त यह सम्पूर्ण भौतिक ब्रह्माण्ड विलीन होने लगता है। उस चरम समय में स्वयं सत्यलोक भी नष्ट हो जाता है। तब सत्यलोक में निवास करने वाले भगवान ब्रह्मा तथा वहाँ उपस्थित सभी ज्ञानवान और पूर्णतः सिद्ध आत्माएँ अपने सूक्ष्म शरीरों को त्याग कर विशुद्ध चिन्मय शरीर धारण करती हैं और भौतिक आवरणों को पार करते हुए शाश्वत वैकुण्ठ या गोलोक में प्रवेश करती हैं।
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