विस्तृत उत्तर
महाराज प्रियव्रत ने जब देखा कि भगवान सूर्य के प्रकाश के कारण पृथ्वी का केवल आधा भाग ही प्रकाशित होता है और शेष आधा भाग अंधकार में डूबा रहता है तो उन्होंने अपने योगबल और परमपिता ब्रह्मा की प्रेरणा से रात्रि के अंधकार को मिटाने का निश्चय किया। उन्होंने सूर्य के रथ का अनुसरण करते हुए एक अत्यंत तेजोमय रथ पर सवार होकर पृथ्वी की सात बार परिक्रमा की। जिस प्रकार सूर्य प्रकाश के साथ भ्रमण करते हैं उसी प्रकार महाराज प्रियव्रत ने भी अपने प्रताप से पृथ्वी को प्रकाशित रखने का प्रयास किया। श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध के प्रथम अध्याय में इस अलौकिक घटना का वर्णन है जो ब्रह्माण्डीय काल-गणना और भू-आकृति विज्ञान का अद्भुत समन्वय है। महाराज प्रियव्रत के इस अलौकिक रथ के पहियों के प्रगाढ़ दबाव से पृथ्वी पर सात गहरी वलयाकार खाइयाँ बनीं जो सात महासागर बन गईं।
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