विस्तृत उत्तर
विष्णु पुराण और मार्कण्डेय पुराण के अनुसार भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक — ये तीनों लोक 'कृतक त्रैलोक्य' हैं जो नैमित्तिक प्रलय के समय पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। इसके विपरीत महर्लोक 'अकृतक लोक' है। नैमित्तिक प्रलय में जब सात प्रलयंकारी सूर्यों की अग्नि भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक को भस्म कर देती है तब यह अग्नि महर्लोक तक तो पहुँचती है परंतु वहाँ की पवित्र और तपस्वी प्रकृति के कारण महर्लोक को जला नहीं सकती। तथापि इस अग्नि से उत्पन्न भयंकर ताप के कारण महर्लोक के निवासी जैसे भृगु आदि ऋषि उस स्थान को छोड़कर जनलोक में चले जाते हैं। इस प्रकार महर्लोक अग्नि से जलता नहीं है परंतु ताप के कारण अस्थायी रूप से निर्जन हो जाता है।
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