विस्तृत उत्तर
यह प्रश्न एक भ्रम से उत्पन्न होता है कि मेहनत और भगवान पर भरोसा दो विपरीत बातें हैं — जबकि वास्तव में ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। हिंदू धर्म दोनों को एक साथ जीने का मार्ग सिखाता है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने जो संदेश दिया है वह संसार का सबसे संतुलित जीवन-दर्शन है। उन्होंने कहा — 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' — अर्थात कर्म करो, फल की चिंता भगवान पर छोड़ो। इसमें कर्म और भगवान पर विश्वास, दोनों एक साथ हैं।
कर्मयोग का सार यही है — पूरी शक्ति से मेहनत करो, परंतु उसे भगवान को समर्पित करके करो और परिणाम की चिंता से मुक्त रहो। यह आलस्य का निमंत्रण नहीं है, न ही अंधा भाग्यवाद। यह सक्रिय कर्म और आंतरिक समर्पण का अनूठा संयोग है।
शास्त्र में कहा गया है — 'उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः' — अर्थात काम केवल सोचने से नहीं, करने से सिद्ध होते हैं। इस प्रकार मेहनत को तिलांजलि देना धर्म नहीं है। साथ ही यह भी सत्य है कि केवल मेहनत और ईश्वर की कृपा के बिना सफलता अधूरी और अहंकार-युक्त होती है।
व्यावहारिक रूप में — अपनी ओर से पूरी तैयारी करो, फिर भगवान पर भरोसा रखो कि वे सही समय पर सही परिणाम देंगे। जैसे किसान बीज बोता है, खेत सींचता है, और फिर आकाश से वर्षा की प्रतीक्षा करता है — दोनों साथ चलते हैं।





