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मंदिर पूजा📜 भागवत पुराण (2.2.8-13), भगवद्गीता (12.8), योगसूत्र (3.1-3), विष्णु पुराण2 मिनट पठन

मंदिर में पूजा के दौरान भगवान का ध्यान कैसे करें?

संक्षिप्त उत्तर

भागवत (2.2.8-13): चरणों से आरंभ कर क्रमशः पूरे स्वरूप पर ध्यान। गीता (12.8): मन और बुद्धि भगवान में लगाओ। मानसी पूजा ध्यान का उच्चतम रूप। भाव: 'साक्षात् भगवान सामने हैं' — यही सच्चा ध्यान।

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विस्तृत उत्तर

भगवान का ध्यान — शास्त्रोक्त विधि:

भागवत पुराण (2.2.8-13) — क्रमिक ध्यान विधि

श्री शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को क्रमशः भगवान के विभिन्न अंगों पर ध्यान केंद्रित करने की विधि बताई:

  1. 1पहले चरणों पर ध्यान करें (आधार)
  2. 2फिर ऊपर उठते हुए — पाँव, पिंडली, जंघा, नाभि
  3. 3वक्षस्थल पर श्रीवत्स और कौस्तुभ मणि
  4. 4कंठ, मुख, चतुर्भुज, नयन
  5. 5अंत में पूरे स्वरूप पर ध्यान

भगवद्गीता (12.8)

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।'

— मन को मुझमें स्थिर करो, बुद्धि को मुझमें लगाओ — फिर मुझमें ही निवास करोगे।

ध्यान की व्यावहारिक विधि

1बाह्य सहायता

मूर्ति को देखकर आँखें बंद करें — स्मृति में वही स्वरूप धारण करें। यह 'मूर्ति-आधारित ध्यान' शास्त्रसम्मत है।

2श्रेष्ठ ध्यान-स्थान

पद्मासन या सुखासन में बैठें। रीढ़ सीधी। आँखें बंद या अर्धखुली।

3मानसी पूजा

मन में ही भगवान को — स्नान कराना, वस्त्र पहनाना, भोग लगाना — यह 'मानसी पूजा' ध्यान का उच्चतम रूप है। (भागवत पुराण)

4नाम-श्वास संयोग

श्वास लेते समय 'हरि' — छोड़ते समय 'ॐ' — यह प्रत्येक श्वास को ध्यान बनाता है।

5योगसूत्र (3.1-3) — धारणा-ध्यान-समाधि

एक बिंदु (भगवान के स्वरूप) पर मन स्थिर करना = धारणा। निरंतर वहाँ बने रहना = ध्यान। भेद मिट जाना = समाधि।

सरल सूत्र

मंदिर में भगवान की मूर्ति देखकर यही भावना करें — 'ये साक्षात् भगवान हैं, मैं इनके सामने हूँ।' यह भाव ही सच्चा ध्यान है।

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शास्त्रीय स्रोत
भागवत पुराण (2.2.8-13), भगवद्गीता (12.8), योगसूत्र (3.1-3), विष्णु पुराण
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