विस्तृत उत्तर
भगवान का ध्यान — शास्त्रोक्त विधि:
भागवत पुराण (2.2.8-13) — क्रमिक ध्यान विधि
श्री शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को क्रमशः भगवान के विभिन्न अंगों पर ध्यान केंद्रित करने की विधि बताई:
- 1पहले चरणों पर ध्यान करें (आधार)
- 2फिर ऊपर उठते हुए — पाँव, पिंडली, जंघा, नाभि
- 3वक्षस्थल पर श्रीवत्स और कौस्तुभ मणि
- 4कंठ, मुख, चतुर्भुज, नयन
- 5अंत में पूरे स्वरूप पर ध्यान
भगवद्गीता (12.8)
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।।'
— मन को मुझमें स्थिर करो, बुद्धि को मुझमें लगाओ — फिर मुझमें ही निवास करोगे।
ध्यान की व्यावहारिक विधि
1बाह्य सहायता
मूर्ति को देखकर आँखें बंद करें — स्मृति में वही स्वरूप धारण करें। यह 'मूर्ति-आधारित ध्यान' शास्त्रसम्मत है।
2श्रेष्ठ ध्यान-स्थान
पद्मासन या सुखासन में बैठें। रीढ़ सीधी। आँखें बंद या अर्धखुली।
3मानसी पूजा
मन में ही भगवान को — स्नान कराना, वस्त्र पहनाना, भोग लगाना — यह 'मानसी पूजा' ध्यान का उच्चतम रूप है। (भागवत पुराण)
4नाम-श्वास संयोग
श्वास लेते समय 'हरि' — छोड़ते समय 'ॐ' — यह प्रत्येक श्वास को ध्यान बनाता है।
5योगसूत्र (3.1-3) — धारणा-ध्यान-समाधि
एक बिंदु (भगवान के स्वरूप) पर मन स्थिर करना = धारणा। निरंतर वहाँ बने रहना = ध्यान। भेद मिट जाना = समाधि।
सरल सूत्र
मंदिर में भगवान की मूर्ति देखकर यही भावना करें — 'ये साक्षात् भगवान हैं, मैं इनके सामने हूँ।' यह भाव ही सच्चा ध्यान है।




