विस्तृत उत्तर
पूजा में बैठने के आसन का विशेष महत्व है — यह पृथ्वी की ऊर्जा के साथ साधक के शरीर के संबंध को नियंत्रित करता है:
भगवद्गीता (6.11-12) — आसन का आदर्श
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्।।'
— शुद्ध स्थान पर, न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा, कुश के ऊपर मृगचर्म, उसके ऊपर वस्त्र — इस प्रकार का स्थिर आसन।
आसन की श्रेष्ठता का क्रम (तंत्रसार और मनुस्मृति के अनुसार)
1कुशासन (सर्वोत्तम)
कुश घास का आसन — वेद-विहित, ऋषि-परंपरा से। पृथ्वी की ऊर्जा का सर्वोत्तम संवाहक।
2ऊनी आसन (कम्बल)
कुलार्णव तंत्र: ऊनी आसन ऊर्जा को शरीर में संरक्षित करता है (इंसुलेटर का काम)। जप-ध्यान के लिए विशेष।
3मृगचर्म (हिरण की खाल)
भगवद्गीता में उल्लिखित। परंतु आधुनिक समय में — वन्यजीव संरक्षण कानूनों के कारण — इसका उपयोग न करें। ऊनी या कुश आसन उचित विकल्प हैं।
4रेशमी आसन
तंत्र साधना में रेशम का आसन — विशेष अनुष्ठानों के लिए।
5सूती आसन
सामान्य पूजा में स्वीकार्य।
वर्जित आसन
- ▸नंगी जमीन पर बैठना — शक्ति का ह्रास होता है (तंत्रसार)
- ▸लकड़ी के तख्ते पर — सामान्यतः वर्जित
- ▸प्लास्टिक/रबर का आसन — पृथ्वी-ऊर्जा अवरुद्ध करता है
बैठने की मुद्रा
पद्मासन या सुखासन श्रेष्ठ। यदि संभव न हो तो वज्रासन। पीठ सीधी रखें।
पातञ्जल योगसूत्र (2.46)
स्थिरसुखमासनम्।' — आसन वह हो जो स्थिर और सुखद हो — यही आसन की मूल परिभाषा है।





