विस्तृत उत्तर
आत्मिक शांति और सांसारिक शांति में अंतर है। शास्त्र आत्मिक शांति को 'प्रशान्तमनस' या 'आत्मप्रसाद' कहते हैं:
कठोपनिषद (2.3.17)
शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वा आत्मन्येवात्मानं पश्येत्।
— शांत, जितेंद्रिय, और समाहित होकर आत्मा में ही आत्मा का दर्शन करना — यही आत्मिक शांति का मार्ग है।
भगवद्गीता (6.20-22) — आत्मिक शांति का वर्णन
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति।।'
— ध्यान में जब चित्त शांत होता है और आत्मा आत्मा में ही आनंदित होती है — वह आत्मिक शांति है।
मंदिर में पूजा से आत्मिक शांति के कारण
1बाह्य जगत से विराम
पूजा का समय संसार से पूर्ण विराम का समय है। यह विराम आत्मा को अपने स्वरूप में लौटने का अवसर देता है।
2भागवत (3.25.20) — सत्संग और भक्ति
सत्सङ्गात्सर्वसंसारतरणं।' — सत्संग और भक्ति ही संसार से पार करने वाले हैं। मंदिर यह सत्संग प्रदान करता है।
3आत्म-समर्पण
पूजा में भगवान के चरणों में अपनी सारी चिंताएं, भय, और अपेक्षाएं अर्पित करने से मन का बोझ हल्का होता है — यही आत्मिक शांति का आरंभ है।
4माण्डूक्य उपनिषद — 'ओम' का जप
ओम के जप से आत्मा अपने मूल तुरीय अवस्था के निकट आती है — यह गहनतम आत्मिक शांति है।
5नित्य क्रिया
पूजा की नित्यता मन को आत्मिक विकास के पथ पर स्थिर रखती है — उतार-चढ़ाव में भी साधक का केंद्र बिंदु बना रहता है।





