विस्तृत उत्तर
मंदिर में रात्रि विश्राम (सोना) के विषय में स्पष्ट नियम और अपवाद दोनों हैं।
सामान्य नियम — गर्भगृह/पूजा स्थल में सोना वर्जित
मंदिर के गर्भगृह, मंडप, या मुख्य पूजा स्थल में सोना पूर्णतः वर्जित है। यह देवता का निवास है — यहाँ शयन = देवता का अपमान।
कारण
- ▸गर्भगृह = देवता का गृह — जैसे किसी के ड्राइंग रूम में बिना अनुमति सोना अशिष्ट, वैसे ही
- ▸रात्रि में गर्भगृह बंद — शयन आरती के बाद 'देवता सो रहे हैं'
- ▸शुचिता — सोते समय शरीर की स्थिति अनियंत्रित, अशुद्धि सम्भव
- ▸पैर देवता की ओर हो सकते हैं = अपमान
अपवाद — कहाँ सो सकते हैं
1धर्मशाला/यात्री निवास
अनेक बड़े मंदिरों में तीर्थयात्रियों के लिए धर्मशाला/अतिथि गृह की व्यवस्था होती है। यहाँ सोना पूर्णतः उचित और शास्त्रसम्मत। उदाहरण: तिरुपति (TTD कॉटेज), जगन्नाथ, वैष्णो देवी, केदारनाथ।
2मंदिर प्रांगण/बरामदा
कुछ मंदिरों में बरामदे या प्रांगण में यात्रियों को विश्राम की अनुमति — विशेषतः छोटे गाँव के मंदिरों में। मंदिर प्रबंधन से अनुमति आवश्यक।
3आपातकालीन स्थिति
यदि कोई बीमार/थका हुआ व्यक्ति आश्रय लेना चाहे — अनेक मंदिर मानवीय आधार पर अनुमति देते हैं।
4साधु-सन्यासी
कुछ मंदिरों में साधु-सन्यासियों के लिए विशेष व्यवस्था — मठ/आश्रम संलग्न।
यदि मंदिर परिसर में सोना पड़े — नियम
- ▸पैर देवता/गर्भगृह की ओर न करें
- ▸शुद्ध वस्त्र पहनें
- ▸शांत और अनुशासित रहें
- ▸गर्भगृह से दूर रहें
- ▸मंदिर प्रबंधन की अनुमति अनिवार्य
घर के मंदिर में
यदि बेडरूम में ही मंदिर हो (जगह की कमी) — रात को मंदिर पर पर्दा डालें, पैर मंदिर की ओर न करें।





