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मंदिर में शयन आरती क्या होती है और कब होती है?

शयन आरती: दिन की अंतिम पूजा — देवता को रात्रि विश्राम हेतु विदा। समय: रात 9-10:30।

संक्षिप्त उत्तर

शयन आरती: दिन की अंतिम पूजा — देवता को रात्रि विश्राम हेतु विदा। समय: रात 9-10:30। विधि: शयन भोग (दूध/मिठाई) → दीपक आरती → शयन स्तोत्र → रात्रि वस्त्र → पट बंद। भाव: देवता = परिवार सदस्य। जगन्नाथ: बड़शिंगार,: शयन आरती कीर्तन। इसके बाद गर्भगृह बंद → प्रातः मंगल आरती तक।

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विस्तृत उत्तर

शयन आरती मंदिर की दैनिक पूजा का अंतिम चरण है जिसमें देवता को रात्रि विश्राम के लिए विदा किया जाता है।

शयन आरती क्या है

दिन की सभी पूजा, भोग, और आरतियों के बाद रात्रि में देवता को 'शयन' (निद्रा) के लिए विदा करने की आरती। इसके बाद गर्भगृह के पट (द्वार) बंद कर दिए जाते हैं।

समय

रात्रि 9 बजे से 10:30 बजे के बीच (मंदिर अनुसार भिन्न)।

विधि:1. शयन भोग

  • ▸रात्रि का अंतिम भोग — प्रायः दूध, मिठाई, पान
  • ▸कुछ मंदिरों में शयन भोग में केवल दूध

1शयन आरती

  • ▸दीपक/कर्पूर से आरती
  • ▸शयन स्तोत्र/प्रार्थना पाठ
  • ▸वैष्णव: 'शयन आरती' विशिष्ट गीत
  • ▸शैव: शिव को शयन के लिए भस्म अर्पित

2शृंगार/वस्त्र

  • ▸कुछ मंदिरों में देवता को रात्रि वस्त्र पहनाए जाते हैं
  • ▸हल्के/आरामदायक वस्त्र
  • ▸चन्दन लेप

3पट बंद

  • ▸शयन आरती के बाद गर्भगृह के द्वार (पट) बंद
  • ▸'शुभ रात्रि' प्रार्थना
  • ▸देवता को शय्या (विशेष पलंग) पर विराजित

भाव

  • ▸देवता को सगुण रूप में परिवार के सदस्य मानना
  • ▸जैसे घर में रात को बच्चे/बड़ों को सुलाते हैं — वैसे ही देवता का शयन
  • ▸यह षोडशोपचार पूजा का 'शय्या उपचार'

प्रमुख मंदिरों में शयन आरती

  • ▸'शयन आरती' — विशिष्ट भजन और कीर्तन
  • ▸जगन्नाथ पुरी: 'बड़शिंगार' — अत्यन्त भव्य रात्रि श्रृंगार और शयन
  • ▸बांके बिहारी (वृन्दावन): 'शयन दर्शन' — अंतिम दर्शन
  • ▸तिरुपति: 'एकान्त सेवा' — अंतिम निजी सेवा

शयन आरती के बाद

  • ▸गर्भगृह पूर्णतः बंद
  • ▸कोई भक्त प्रवेश नहीं
  • ▸अगले प्रातः मंगल आरती तक

आध्यात्मिक तात्पर्य

भक्त रात को सोने से पहले देवता की शयन आरती का स्मरण करे — 'मेरे प्रभु सो रहे हैं, मैं भी शांति से सोऊँ।' यह दैनिक जीवन को भक्ति से जोड़ने का सरल उपाय।

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शयन आरती क्या है

दिन की सभी पूजा, भोग, और आरतियों के बाद रात्रि में देवता को 'शयन' (निद्रा) के लिए विदा करने की आरती। इसके बाद गर्भगृह के पट (द्वार) बंद कर दिए जाते हैं।

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