विस्तृत उत्तर
जप में मन स्थिर रखने के उपाय भगवद् गीता और पातंजल योग में वर्णित हैं:
भगवद् गीता (6.25-26)
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्।।'
— धीरे-धीरे, धैर्यपूर्ण बुद्धि से शांत हों। मन को आत्मा में स्थिर करें।
मन स्थिर करने के उपाय
1धीरे जप
जल्दी जप से मन भटकता है। धीरे-धीरे, अर्थ के साथ जप करने से मन लगता है।
2एकतत्त्वाभ्यास
पातंजल (1.32): एक ही तत्व पर बार-बार मन को लाना। जप में — एक मंत्र, एक देव।
3श्वास-जप संयोग
श्वास के साथ मंत्र — मन वर्तमान में बंधा रहता है।
4देव की दृष्टि
भगवान मुझे देख रहे हैं' — यह भाव मन को केंद्रित रखता है।
5अभ्यास का संचय
पातंजल (1.14): 'सतु दीर्घकालनैरंतर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः।'
— दीर्घकाल, निरंतरता और सत्कार से किया अभ्यास दृढ़ होता है।
6थकान न लें
मन थके तो जप रोकें। थके मन से जप से अधिक विक्षेप होता है।
सत्य
मन का भटकना स्वाभाविक है। भटकाव के बाद वापस लौटना — यही अभ्यास है।





